मेरे दाता के दरबार में है

0
81
मेरे दाता के दरबार में है

मेरे दाता के दरबार में है

मेरे दाता के दरबार में है
सब लोगों का खाता।
जो कोई जैसी करनी करता
वैसा ही फल पाता।

उजली करनी करियो लाला,
करम न करियो काला।
लाख आंख से देख रहा है,
तुझे देखने वाला।
उसकी तेज नजर से बन्दे,
कोई नहीं बच पाता-मेरे दाता….।

क्या साधु क्या संत गृहस्थी,
क्या राजा क्या रानी।
प्रभु की पुस्तक में लिखी है,
सब की कर्म कहानी।
अन्तर्यामी अन्दर बैठा,
सबका हिसाब लगाता मेरे दाता….।

बड़े-बड़े कानून प्रभु के,
बड़ी कड़ी मर्यादा।
किसी को कौड़ी कम नहीं मिलती,
नहीं किसी को ज्यादा ॥
इसलिए तो दुनियां का वह,
जगत्पति कहलाता-मेरे दाता….।

चले न उसके आगे रिश्वत,
चले नहीं चालाकी।
उसके लेने-देने की बन्दे,
रीत बड़ी है बांकी।
पुण्य का बेड़ा पार करे वो,
पाप की नाव डुबाता-मेरे दाता….।

फेरता वही हिसाब सभी का,
एक आसन पै डट के।
उनका फैसला कभी न पलटे,
लाख कोई सर पटके।
समझदार तो चुप है रहता,
मूरख शोर मचाता-मेरे दाता….।