गेह की शोभा
गेह की शोभा है दीप से,
देह की नैन से,
राजा की राज से शोभा ।।
कूप की नीर से,
धेनु की क्षीर से,
मानव की शुभ काज से शोभा ।।
रैन की चन्द्र से,
मेघ की विज्जु से,
जैसे है नारी की लाज से शोभा।
तैसे ‘प्रकाश’ है शहर व ग्राम की
पावन आर्यसमाज से शोभा ।।
























