खुशी नगर में हुई (नामकरण संस्कार)
खुशी नगर में हुई, निर्धन को दौलत पा गई,
सुन्दर बालक मिला बड़ी हरषाई है,
बनी सपूती घर घर बँधी बधाई है।
मुख बार बार चूम गले से लगाती रही।
पलने में झुलाती कभी गोदी में डुलाती रही।
पकड़-पकड़ उँगली उसे आँगन में खिलाती रही ।।
झुन झुना बजाकर उसे बोलना सिखाती रही ।।
लिया समरकन्द रख नाम खुशी अति छाई है।
बनी सपूती घर घर बँटी बधाई है।। 1 ।।
उजड़े हुए गुलशन में फिर से बहार आई।
पूर्णिमा का चन्द्र निरख कली कली मुस्कराई ।।
माँ का प्यार मिला शिशु होने लगा पुष्ट भाई।
रोता हँसता रहता कभी हो जाता रुष्ट भाई ।।
समरकन्द मकतब में दिया पठाई है।
बँटी बधाई है।।2।। बनी सपूती घर घर….
आनन्द मनाने लगा। लाड़ चाव प्यार से
आठ साल बीते कुँवर पाठशाला जाने लगा।
खेल-कूद पढ़ने में सबसे फस्ट आने लगा।
बेगम को आयतें कुरान की सुनाने लगा।
जुग जुग जीओ कुँवर को रही सुनाई है।
बनी सपूती घर घर बँटी बधाई है।।3।।
एक दिन बेगम समरकन्द को सुनाने लगी।
मुख चूम चूम बातें पुरानी बतलाने लगी ।।
शहजादे को किस्सा सारा बूंदी का समझाने लगी।
जिसे सुन-सुनकर तबियत श्याम की घबराने लगी ।।
बात ‘स्वरूपानन्द’ न छिपी छिपाई है।
बनी सपूती घर घर बँटी बधाई है।।4।।
























