आर्य वीर दल बढ़ता चल

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आर्य वीर दल बढ़ता चल

आर्य वीर दल बढ़ता चल

आर्य वीर दल बढ़ता चल,
उन्नति शिखर पर चढ़ता चल ।
भूले हुए वेद-पथ जन जो,
उनकी राहें बदलता चल ।।

पावन वैदिक पथ पर चलकर,
अपना फर्ज निभाये जा।
हर दिल का कर दूर अँधेरा,
पग-पग दीप जलाये जा ।।
आँधी या बरसात हो,
धूप छाँव या रात हो।
कस्बा, शहर, देहात हो,
सत्य मार्ग पर चलता चल ।। 1 ।।

भय, विघ्न, विषद और बाधायें
सारी दूर भगा डालो।
सुख-शांति सुधारस बरसाकर
जन-जन की प्यास बुझा डालो।
शैल, शिला, तरु तोड़कर,
पाखंड का सिर फोड़कर।
गर्दन पकड़ मरोड़कर,
तू मृग के तुल्य उछलता चल ।। 2 ।।

वेद संस्कृति रक्षार्थ को,
आर्य वीर तैयार रहो।
ढोंगी धूर्त जनों के लिए
बनकर कठोर दीवार रहो ।।
ओ३म् ध्वजा ले हाथ में,
जोश भरा हो गात में।
ईश्वर तेरे साथ में,
सोई तकदीर बदलता चल ।।3।।

जैमिनी, कपिल, कणादि, दयानन्द
ऋषियों की सन्तान हो तुम।
लंकेश दैत्य रावण की लंका
जलाने को हनुमान हो तुम ।।
कुटिल कुप्रथा बन्द हो,
घर घर में आनन्द हो।
कहे स्वरूपानन्द वीर बन
बब्बर शेर मचलता चल ।। 4 ।।