सत्ता तुम्हारी भगवन् जग में समा रही है।

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सत्ता तुम्हारी भगवन् जग में समा रही है।

ईश महिमा

सत्ता तुम्हारी भगवन् जग में समा रही है।
तेरी दया सुगन्धि हर गुल से आ रही है।
रवि चन्द्र और तारे तूने बनाये सारे,
इन सब में ज्योति तेरी, इक जग मगा रही है।
सत्ता तुम्हारी भगवन……….

विस्तृत वसुन्धरा पर सागर बहाये तूने,
तह जिनकी मोतियों से अब चमचमा रही हैं।
सत्ता तुम्हारी भगवन……….

दिन रात प्रातः सन्ध्या मध्यहान् भी बनाया,
हर ऋतु पलट-पलट कर करतब दिखा रही है।
सत्ता तुम्हारी भगवन………

हे ब्रह्म ! विश्वकर्ता, वर्णन हो तेरा कैसे,
जल-थल में तेरी महिमा, हे ईश! छा रही है।
सत्ता तुम्हारी भगवन……….

सत्ता तुम्हारी भगवन् जग में समा रही है।
तेरी दया सुगन्धि हर गुल से आ रही है।।
सत्ता तुम्हारी भगवन…………….