कर रही है खोज नई नित बुद्धि इन्सान की।

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कर रही है खोज नई नित बुद्धि इन्सान की।

कर रही है खोज नई नित बुद्धि इन्सान की।

कर रही है खोज नई
नित बुद्धि इन्सान की।
लेकिन है अफसोस अब
तक अपनी ना पहचान की ।।


पर्वतों की चोटी नापी
सागर की गहराई को।
हवा की रफ्तार नापी
पृथ्वी की गोलाई को।
ऊँचाई को नाप डाला
शशि की और भान की ।।
लेकिन है अफसोस…..।।1।।

नये-नये अस्त्र शस्त्रों
का आविष्कार किया।
आज के मानव ने मानव
चांद पै सवार किया।
डार दिया हैरत में
जग दौड़ से विज्ञान की।।
लेकिन है अफसोस…. ।।2।।

पक्षियों की तरह आज
उड़ रहा आकाश में।
जलचर बनकर रहने
लगा जलचरों के पास में।
आस में बैठा है भक्त बन
करके भगवान की ।।
लेकिन है अफसोस….।।3।।

साधन सब जुटा दिये
हैं ऐशो आरामों के।
नक्शे बदल डाले है
नगरों व ग्रामों के ।
इनामों के ऊपर ‘प्रेमी “
शर्त जान जान की।।
लेफिन है अफसोस….।।4।।