इंसान इंसान नहीं रहा

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इंसान इंसान नहीं रहा

इंसान इंसान नहीं रहा (तर्ज- तेरी प्यारी-प्यारी सूरत..)

इंसान इंसान नहीं रहा
बन गया है पशु समान।
मेरे भगवान् मानव-मानवता
खो बैठा न रही अपनी पहचान।।

मेरे भगवान् नित्यकर्म का ज्ञान नहीं,
बड़ों का आदर मान नहीं।
राम-भरत और शत्रुघ्न जैसी
दीखे अब सन्तान नहीं।
अब माता-पिता और गुरूजनों
का होने लगा अपमान।।

मेरे भगवान् बेदों का कुछ ज्ञान नहीं,
कहते हैं भगवान नहीं।
संध्या हवन से प्रेम नहीं,
और शुभकर्मों में दान नहीं।
बस एक ही नारा रह गया है
रोटी कपड़ा और मकान।।

मेरे भगवान् मंदिर में नहीं आते है,
सिनेमा रोज ही जाते है।
अंडे मछली मांस हैं खाते,
व्हिस्की खूब उड़ाते हैं।
युवकों की ऐसी देख दशा,
होता है दुःख महान।।

मेरे भगवान् द्वार तेरे जो आता है,
मुंह मांगा फल पाता है।
मानव, मानव बन जाये,
नंदलाल यही अब चाहता है।
विनती है आपसे एक यही,
इंसान बने इंसान। मेरे भगवान्