हम कभी माता-पिता का, ऋण चुका सकते नहीं।

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हम कभी माता-पिता का, ऋण चुका सकते नहीं।

हम कभी माता-पिता का, ऋण चुका सकते नहीं।

हम कभी माता-पिता का,
ऋण चुका सकते नहीं।
इनके तो अहसाँ हैं इतने,
हम गिना सकते नहीं।। टेक।।
हम कभी माता-पिता का ऋण…….

वो कहाँ पूजा में शक्ति,
वो कहाँ फल जाप का।
हो तो हो इनकी कृपा से,
खातमा संताप का।
इनकी सेवा से मिले धन,
ज्ञान बल लम्बी उमर।

स्वर्ग से बढ़कर है जग में,
आसरा माँ बाप का।
इनकी तुलना में कोई,
वस्तु भी ला सकते नहीं।।
हम कभी माता-पिता का ऋण………

देख लें हमको दुःखी तो,
भर लें अपने नैन ये।
इक हमारी सुख की खातिर,
तड़पते दिन रैन ये।
भूख लगती प्यास ना और,
नींद भी आती नहीं।

कष्ट हो तन पर हमारे,
हों उठे बेचैन ये।
इनसे बढ़कर देवता भी,
सुख दिला सकते नहीं।।
हम कभी माता पिता का, ऋण……..

पढ़ लो वेद और शास्त्र का ही,
एक यह मर्म है।
योग्यतम सन्तान का यह,
सबसे उत्तम कर्म है।

इनके चरणों में यह
तन, मन, धन लुटाना धर्म है।
जगत में जब तक रहे,
सेवा करें माँ बाप की।
यह ‘पथिक’ वह सत्य है,
जिसको मिटा सकते नहीं।
हम कभी माता पिता का, ऋण…….