भक्ति भरे भाव ने
रङ्ग, तेरा ही रङ्गवाया
मूक हूँ फिर भी तेरी
तान को सुन पाया
मैं गुमसुम प्रभु रहा तुझे सुन
रोम-रोम हुआ मेरा प्रसन्न
बागडोर मेरी तू ने सम्भाली
और मगन हुआ सुन तेरी धुन
भक्ति भरे भाव ने
रङ्ग, तेरा ही रङ्गवाया
आधार श्रुतियों का ऐसा मिला
अङ्ग अङ्ग तेरा प्रेम खिला
बह गई गङ्गा भक्ति भाव की
बिन छबि छैल छबीली की सुन
भक्ति भरे भाव ने
रङ्ग, तेरा ही रङ्गवाया
भावना स्तुति रूप मन में उठी
हुए निहाल ईश-कृपा बरसी
देख प्रभु को हृदयासन पे
हुआ अचानक हर्ष में गुमसुम
भक्ति भरे भाव ने
रङ्ग, तेरा ही रङ्गवाया
तू है विधाता – मैं हूँ विधान
तू दानी – तुझे क्या दूँ दान ?
हो गया तुझमें आत्मसमर्पित
भेंट यही बस तुझमें हुआ गुम
भक्ति भरे भाव ने
रङ्ग, तेरा ही रङ्गवाया
मूक हूँ फिर भी तेरी
तान को सुन पाया
भक्ति भरे भाव ने
रङ्ग, तेरा ही रङ्गवाया
रचनाकार व स्वर :- पूज्य श्री ललित मोहन साहनी जी – मुम्बई
*रचना दिनाँक :– *
राग :- यमन कल्याण
गायन समय रात्रि का दूसरा प्रहर, ताल कहरवा ८ मात्रा
शीर्षक :- भेंट का अभाव
*तर्ज :- *
शब्दार्थ :-
मूक = गूंगा
बागडोर = लगाम
श्रुति = वेद-कथन
छैल छबीला = सुसज्जित युवा
विधान = व्यवस्था, स्थिति
प्रस्तुत भजन से सम्बन्धित पूज्य श्री ललित साहनी जी का सन्देश :– 👇👇
प्राक्कथन
प्रिय श्रोताओं व पाठको पिछली बार इस मन्त्र पर गुजराती भजन की रचना की थी
(मारा ने जीवन ने प्रभु सफल करी द् यो)
अब इसी मन्त्र पर हिन्दी में वैदिक भजन की रचना की है। आशा करता हूं कि यह वैदिक भजन, मन्त्रोंपदेश के साथ, आपको आनन्द की अनुभूति कराएगा।
भेंट का अभाव
मेरी जान! तुझे स्तुति का अवसर नहीं मिला तो क्या हुआ? प्रभु के नाम का जप करने से आखिर लाभ तो सही है ना कि हमारे अंग अंग में प्रभु का प्रेम रम जाए। प्रभु के गुणों का गान एक मुख से नहीं सहस्त्र मुख से ही। भक्ति की गंगा हमारे रोम-रोम में बह जाए। सो तो अपने आप हो रहा है। हमारी प्रत्येक क्रिया की बागडोर प्रभु ने स्वयं संभाल ली है। मैं तो बोल ही नहीं रहा पर मेरा सारा शरीर वाचाल है रोम-रोम को ज़बान बनाकर वाचाल है।
प्रभु बिना जाप के, बिना प्रार्थना थे, बिना स्तुति के रीझ गए हैं। हृदय में स्तुति की भावना ही उठी थी। विचार ही आया था कि उसका गुणगान करें। इतने ही में प्रभु निहाल हो गए। सोमरस की वर्षा कर दी। मेरे रूम रोम बसे उनकी चाटने आंखों ने लगी मधु देर असली झांकियां। उनकी मीठी सुरीली आवाज मेरे कानो में पड़ रही है। शादी का या कान हो उठी है। मैं आश्चर्यचकित मूक हूं। इस प्रकार अचानक पधार गए प्रभु की क्या चीज भेंट करुं? इस समय मेरे पास है भी तो क्या? मेरी वाणी हर ली गई। मुझ में तो बोलने की शक्ति ही नहीं जिससे घर आए प्रभु का स्वागत तो कर लूं। मेरी तो अब छोटी से छोटी चेष्टा प्रभु के अधीन हो गई है। वे विधाता हैं और मैं विधान। इस समय उनकी भेंट क्या वस्तु करूं? आत्मसमर्पण? मेरे पास आत्मा ही कहां है? आज तो मेरा अपना आप ही खोया ही गया है। प्रभु को क्या दूं? ‘भृतिं न भर–कुछ भेंट मत कर। आज भेंट ना देना ही भेंट है। भेंट का अभाव सबसे बड़ी भेंट है। आज के स्वागत का रूप स्वागत का नाम हो सकना है। पुरस्कार का स्थान पुरस्कार का अभाव ले रहा है और यही परम पुरस्कार है.










