वयं येभ्यो जाताश्चिरपरिगता एव खलु ते

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वयं येभ्यो जाताश्चिरपरिगता एव खलु ते

शिखरिणी छन्दः

वयं येभ्यो जाताश्चिरपरिगता एव खलु ते
समं यैः संवृद्धाः स्मृतिविषयतां तेऽपि गमिताः।
इदानीमेते स्मः प्रतिदिवसमासन्नपतना
गतास्तुल्यावस्थां सिकतिलनदीतीरतरुभिः॥३४॥

॥ वैराग्यशतकम् ॥


  • अर्थ: जिन माता-पिता से हमने से हमने जन्म लिया था, वे तो बहुत समय हुआ स्वर्ग सिधार गए। जिने के साथ हम बढ़े और खेले वे मित्र भी स्मरण की वस्तु बन गये वे भी संसार छोड गये।. इस समय हम लोग भी बालू (रेत) की नदी के तट पर खड़े हुए वृक्षों की भाँति पतन की अवस्था को प्राप्त हो रहे हैं अर्थात् हमारी दशा ‘अब गिरे, तब गिरे’ की कहावत को चरितार्थ कर रही है।