ऊपर को उठ-उठकर अग्नि करती हमें इशारा।

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ऊपर को उठ-उठकर अग्नि करती हमें इशारा।

ऊपर को उठ-उठकर अग्नि करती हमें इशारा
मुखड़ा

ऊपर को उठ-उठकर अग्नि करती हमें इशारा।
जीवन में ऊपर को उठना है कर्तव्य हमारा॥ टेक॥

रुद्ध होते देख अग्नि को हम भी रुद्ध होंगे।
अपनी जीवन ज्योति जगाकर अन्धकार को खोवें।
जीवन के इस रहस्य पर क्या हमने कभी विचारा॥१॥

अग्नि में जो पड़ें पदार्थ अपना आप जलाएँ।
वही पदार्थ खुद जलकर जग में सुगन्ध फैलाएँ।
ऐसा जीवन होवे जिसका वही प्रभु को प्यारा॥२॥

वेदों ने हमारे नित्य कर्म पाँच यज्ञ पाँच यज्ञ बतलाए।
जो मानव श्रद्धापूर्वक यह अपना धर्म निभाए।
उस मानव का इस आवागमन से हो जाए निस्तारा॥३॥

वेदविहित यज्ञादि कर्म है जबसे हमने छोड़ा।
घोर अविद्या में पड़कर विषयों से नाता जोड़ा।
रहा न सुख का नाम कहीं दुःखों ने लिया पसारा॥४॥

जीना भी वह जीना क्या है अपने लिए जो जीना।
जीना सफल वही जो जग में परहित में जो जीना।
परहित जीना परहित मरना यह है धर्म हमारा॥५॥