ऐसी कृपा हो भगवान् घर-घर में यज्ञ हवन हो।

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ऐसी कृपा हो भगवान् घर-घर में यज्ञ हवन हो।

ऐसी कृपा हो भगवान्, घर-घर में यज्ञ हवन हो।
वर्षा हो शान्ति की, सुख की भरी पवन हो। टेक॥

उपकार हो सभी का, पूजा हो जड़ देवों की।
अरु वेद की ध्वनि से, छाया हुआ गगन हो॥१॥

मिलकर सभी तुझो हम, सत्प्रेम से रिझावें।
सत्संग में तेरे ही, गुणगान का कथन हो॥२॥

भक्ति की तेरी निशदिन, लहरा रही हो प्यारी।
सन्ध्या उपासना का, फूला-फला चमन हो॥३॥

सूखे न वह विषय की, जलती हुई हवा से।
रक्षा में बस इसी की, सच्ची सदा लगन हो॥४॥

श्रद्धा व प्रेम जल से, सींचा करें इसे हम।
चारों फलों को पावें, ऐसा कोई यतन हो॥५॥

कुल इष्ट-मित्र मिलकर, परिवार संग अपने।
सबका उसी चमन में, दोनों समय यजन हो॥६॥