उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः

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उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः

वसन्ततिलका छन्दः

श्लोकः

उद्योगिनं पुरुषसिंहमुपैति लक्ष्मीः
दैवेन देयमिति कापुरुषा वदन्ति।
दैवं निहत्य कुरु पौरुषमात्मशक्त्या
यत्ने कृते यदि न सिध्यति कोऽत्र दोषः॥

अर्थ:निरन्तर उद्योग (परिश्रम) करने वाले सिंह के समान पराक्रमी पुरुष के पास लक्ष्मी (सम्पत्ति और सफलता) स्वयं चली आती है। “भाग्य से ही सब कुछ मिलता है” ऐसा तो कायर और आलसी मनुष्य कहते हैं। इसलिए भाग्य के भरोसे रहना छोड़कर अपनी पूरी आत्मशक्ति से पुरुषार्थ (मेहनत) करो। यदि पूरी निष्ठा से प्रयत्न करने पर भी सफलता न मिले, तो यह देखना चाहिए कि कहाँ कमी रह गई; मेहनत करने में कोई दोष नहीं होता।