शिखरिणी छन्दः
करे श्लाध्यस्त्यागः शिरसि गुरुपादप्रणयिता
मुखे सत्या वाणी विजयि भुजयोर्वीर्यमतुलम्।
हृदि स्वच्छा वृत्तिः श्रुतमधिगतं च श्रवणयोः
विनाऽप्यैश्वर्येण प्रकृतिमहतां मण्डनमिदम्॥६१॥
॥ भर्तृहरि नीतिशतकम् ॥
अर्थ: सुपात्र को दान देने से हाथ की शोभा है, गुरु के चरणो में झुकने वाला शिर प्रशंसनीय है, सत्यभाषण मुख की शोभा है, भुजाओं की शोभा विजयकारक अतुलित बल से है, हृदय की शोभा स्वच्छ भावों तथा कानों की शोभा शास्त्र-श्रवण से है। ऐश्वर्य के बिना भी महापुरुषों के ये दिव्य आभूषण है।
























