वसन्ततिलका छन्दः
प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नीचैः,
प्रारभ्य विघ्नविहता विरमन्ति मध्याः।
विघ्नैः पुनः पुनरपि प्रतिहन्यमानाः,
प्रारभ्य चोत्तमजना न परित्यजन्ति।।
(भर्तुहरिकृत- नीतिशतक, श्लो. २६)
भावार्थ- नीच अधम श्रेणी के मनुष्य कठिनाइयों के भय से किसी उत्तम कार्य को प्रारम्भ ही नहीं करते। मध्यम श्रेणी के मनुष्य कार्यों को प्रारम्भ करके विघ्नों से घबराकर बीच में ही छोड़ देते हैं, परन्तु उत्तम श्रेणी के वीर मनुष्य विघ्न बाधाओं से बार-बार पीड़ित होने पर भी प्रारंभ किए हुए उत्तम कार्य को पूरा किए बिना नहीं छोड़ते।
























