व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती

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व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती

वसन्ततिलका छन्दः

व्याघ्रीव तिष्ठति जरा परितर्जयन्ती,
रोगाश्च शत्रव इव प्रहरन्ति देहम्।
आयुः परिस्रवति भिन्नघटादिवाम्भो,
लोकस्तथाप्यहितमाचरतीति चित्रम्।।
(भर्तुहरिकृत- वैराग्यशतक, श्लो. ९६)


भावार्थ- शेरनी के समान भयभीत करने वाला बुढ़ापा सामने खड़ा है, अनेक प्रकार के रोग शत्रुओं के समान शरीर पर आक्रमण कर रहे हैं, और फूटे हुए घड़े में से जैसे निरन्तर पानी रिसता रहता है, वैसे ही आयु क्षीण होती जा रही है, अहो ! कितने आश्चर्य की बात है कि लोग फिर भी पाप कर्मों में लगे हुए हैं।