अनुष्टुप् छन्दः
स्थानाद्बीजादुपष्टम्भान्निःस्यन्दान्निधनादपि।
कायमोधेयशौचत्वात् पण्डिता ह्यशुचिं विदुः।।
(योग. व्यास. २-५)
भावार्थ- गर्भाशय में उत्पन्न होने से, रजवीर्य से बना होने से, खाए हुए पदार्थों से निर्माण होने से, हर क्षण मल निकलता रहने से, मृत्यु होने पर अपवित्र हो जाने से तथा हर समय शुद्धि की अपेक्षा रहने के कारण इस शरीर को बुद्धिमान् लोग अपवित्र बताते हैं।
























