शिखरिणी छन्दः
शवाकारं यावद्भजति मनुजस्तावदशुचिः
परेभ्यः स्यात्क्लेशो जननमरणव्याधिनिलयः।
यदात्मानं शुद्धं कलयति शिवाकारमचलं
तदा तेभ्यो मुक्तो भवति हि तदाह श्रुतिरपि॥३६७॥
॥ विवेकचूडामणि ॥
अर्थ: श्रुति भी यही कहती है कि मनुष्य जबतक इस मृतकतुल्य देह में आसक्त रहता है तबतक वह अत्यन्त अपवित्र रहता है और जन्म, मरण तथा व्याधियों का आश्रय बना रहकर उसको दूसरों से अत्यन्त क्लेश भोगना पड़ता है। किन्तु जब वह अपने कल्याणस्वरूप, अचल और शुद्ध आत्मा का साक्षात्कार कर लेता है तो उन समस्त क्लेशों से मुक्त हो जाता है।
























