क्या कहें क्या भक्त पाता है, प्रभु के ध्यान में।
क्या कहें क्या भक्त पाता है,
प्रभु के ध्यान में।
कुछ अलौकिक रस मिले,
जब मन लगे भगवान में।।
ज्ञान के आलोक से,
तब जगमगाता है हृदय।
रंग-बिरंगे फूल खिलते,
आत्मिक उद्यान में।।
क्या कहें क्या भक्त पाता है, प्रभु ….
संशयों का नाश होता,
पाप के बन्धन करें।
साधना का मार्ग मिलता,
आत्मिक उत्थान में।।
क्या कहें क्या भक्त पाता है, प्रभु….
विषय-विष से जान पड़ते,
वासना की प्यास ना।
तब न आकर्षण रहे,
कुछ काम मद अभिमान में।।
क्या कहें क्या भक्त पाता है, प्रभु……..
याँ लगे सर्वत्र हो,
आनंद वर्षा हो रही।
भक्त जब हो मग्न लगता,
ओ३म् के गुणगान में।।
क्या कहें क्या भक्त पाता है, प्रभु……
‘पाल’ गूँगा किस तरह,
गुड़ की मधुरता कह सके।
मधुरता अनुभूति रहती,
मगर उसके ज्ञान में।।
क्या कहें क्या भक्त पाता है, प्रभु……










