दयानन्द बावनी
कवि दुलेराय काराणी
शूद्र
बड़े-बड़े पड़े कहाँ शूद्रन की कथा कौन।
शूद्र पे समृद्ध दुःख दर्द को छवायो है॥
धर्म भयो छुआछूत शूद्र भयो है अछूत।
धर्म की आड़ में भूत धर्म हु को आयो है॥
काराणी कहत सारे हिन्दवे समाज बीच।
शूद्रन ने अंश एक प्रेम को न पायो है॥
नहीं नेक टेक एक वर्ण में विवेक रेख।
देख देख दिल दयानन्द को दुखायो है॥१४॥
























