दयानन्द बावनी
कवि दुलेराय काराणी
क्षत्रिय
भारत भूमि के रणधीर राजपूत वीर।
दुर्बल को रक्षक वो भक्षक सो भयो है॥
एक मुक्ति काज लाख-लाख बलिदान दिए।
वो ही पराधीनता के पिंजर पुरायो है॥
न्याय नीति नियम नरेश में न रहे शेष।
फैशन के फेर-फेर फन्द में फसायो है॥
नहीं नेक टेक एक वर्ण में विवेक रेख।
देख देख दिल दयानन्द को दुखायो है॥१२॥
























