दयानन्द बावनी
कवि दुलेराय काराणी
वैश्य
ब्राह्मण क्षत्रिय शूद्र वर्ण को आधार वही।
वैश्य वर्ण मरण के चरण तक आयो है॥
वैश्य ने विसार दियो वैश्य धर्म को विचार।
वाको धर्म कर्म सब स्वार्थ में समायो है॥
कपटी कुटिल भयो जीवन जटिल भयो।
एक रत शोषण के रंग में रंगायो है॥
नहीं नेक टेक एक वर्ण में विवेक रेख।
देख देख दिल दयानन्द को दुखायो है॥१३॥
























