दयानन्द बावनी
कवि दुलेराय काराणी
शुद्धि
खुले रखे द्वार धर्म छोड़ जानेवाले काज।
आनेवाले काज दोष दीनो है अशुद्धि को॥
अति मतिमन्द अंध धर्म अधिकारी भयो।
कुबुद्धि के धारी भये बेच मारी बुद्धि को॥
ज्ञानी बन ज्ञान के घमण्ड में गंवाय दीनी।
काराणी कहत सारे देश की समृद्धि को॥
ऐसी विपरीत आर्यावर्त की विपत्ति देखा।
स्वामीजी ने सत्य समझाय दीनी शुद्धि को॥१७॥
























