भिक्षाऽशनं तदपि नीरसमेकवारं

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भिक्षाऽशनं तदपि नीरसमेकवारं

वसन्ततिलका छन्दः

भिक्षाऽशनं तदपि नीरसमेकवारं
शय्या च भूः परिजनो निजदेहमात्रम्।
वस्त्रं च जीर्णशतखण्डमयी च कन्था,
हा-हा तदपि विषयान्न परित्यजन्ति।।
(भर्तुहरिकृत- नीतिशतक, श्लो. २६)


भावार्थ- भिक्षा का भोजन है, वह भी रूखा-सूखा तथा दिनभर में केवल एक बार सोने के लिए भूमि का बिछौना है, अपने शरीर के अतिरिक्त कोई सहायक नहीं है। पहनने ओढ़ने के लिए वस्त्र के रूप में केवल फटी पुरानी गुदड़ी है, जिसमें सैकड़ों पैबन्द लगे हुए हैं। ऐसी दयनीय स्थिति में भी भोग की अभिलाषाएं पीछा नहीं छोड़तीं। शोक ! महाशोक !!