निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु

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निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु

वसन्ततिलका छन्दः


निन्दन्तु नीतिनिपुणा यदि वा स्तुवन्तु,
लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु वा यथेष्टम्।
अद्यैव वा मरणमस्तु युगान्तरे वा,
न्याय्यात् पथः प्रविचलन्ति पदं न धीराः।
(भर्तृहरिकृत- नीतिशतक, श्लो.७९)


भावार्थ- नीति में निपुण व्यक्ति चाहे निन्दा करे या प्रशंसा, धन-ऐश्वर्य की प्राप्ति हो या जो पास में हो वह भी चला जाए, आज ही मृत्यु हो जाए या लम्बे काल तक जीवन बना रहे, किन्तु जो धीर व्यक्ति हैं, वे सत्य, न्याय, आदर्श के मार्ग से एक कदम भी इधर- उधर नहीं हटते, प्रसन्न होकर कष्टों को सहन करते हुए दृढ़ता से उसी मार्ग पर चलते रहते हैं।