शिखरिणी छन्दः
आराध्यः स्वामी तुरगलचित्ता क्षितिभुजो
वयं तु स्थूलेच्छा महति च पदे बद्धमनसः।
जरा देहं मृत्युर्हरति सकलं जीवितमिदं
सखे नान्यच्छ्रेयो जगति विदुषोऽन्यत्र तपसः॥४८॥
॥ वैराग्यशतकम् ॥
अर्थ: स्वामी अत्यन्त कठिनाई से प्रसन्न होने वाला है, चंचल चित्त वाले राजाओं की आराधना (सेवा द्वारा उन्हें अपने वश में करना) भी अति कठिन है। इधर हमारी विशाल अभिलापायें हैं और उधर मोक्षपद की कामना है तथा जरा वृद्धावस्था शरीर को जीर्ण कर रही है और मृत्यु जीवन के तन्तु को ही काट रही है-ऐसी व्यवस्था में हे मित्र ! विद्वान के लिए जगत में तपस्या के अतिरिक्त मोक्ष का अन्य कोई साधन नहीं है।
























