न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति

0
5
न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति

अनुष्टुप् छन्दः 

न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।
हविषा कृष्णवर्त्मेव भूय एवाभिवर्धते।।


भावार्थ- विषय-वासनाएं विषयों को भोगने से नष्ट नहीं होतीं, बल्कि और अधिक बढ़ती हैं, जैसे अग्नि में घी डालने से अग्नि और अधिक बढ़ता है। इच्छाओं के भोग से इच्छा कभी तृप्त नहीं होती। हविषा बार-बार काले मार्ग को और बढ़ाती है।