अनुष्टुप् छन्दः
प्रत्यहं प्रत्यवेक्षेत नरश्चरितमात्मनः।
किन्नु मे पशुभिस्तुल्यं किन्नु सत्पुरुषैरिति। (शारंगधर संहिता)
भावार्थ- मनुष्य को चाहिए, वह प्रत्येक दिन आत्मनिरीक्षण करके पता लगावे कि मेरा जीवन पशुओं के समान केवल खाने-पीने में ही व्यतीत हो रहा है या सत्पुरुषों के समान उत्तम-उत्तम कार्यों में लग रहा है। दूसरे शब्दों में मनुष्य को प्रतिदिन अपने चरित्र का परीक्षण करना चाहिए। क्या मेरा चरित्र पशुओं के समान है या अच्छे मनुष्यों के समान?
























