कर मुझे भवसागर से पार
(तर्ज – मन तड़पत हरि दर्शन को आज)
प्रभु कर मुझे भवसागर से पार।
हर दम तुम सब के प्राणाधार।
ओ… गिरत परत हूँ कितनी बार।
प्रभु कर मुझे……..
१. विश्वपती बिन कौन सहाई ।
तेरे द्वार पे आस लगाई।
कोई नहीं पावन तुम सा द्वार।
प्रभु कर मुझे…….
२. भवजल में तूफ़ान हज़ारों ।
हैं विपरीत दिशाएँ चारों ।
बहुत हुआ मैं अब लाचार ।
प्रभु कर मुझे……..
३. मैं मँझधार में डोल रहा हूँ।
तेरा प्यार टटोल रहा हूँ।
प्रभुवर दे दो अपना प्यार।
प्रभु कर मुझे………
४. हे शिव शंकर सब के स्वामी ।
घट घट वासी अन्तर्यामी ।
टेर ‘पथिक’ सुन ले करतार ।
प्रभु कर मुझे……..
हे जगदीश्वर हे परमेश्वर । प्रभु जी
करुणा कर दो करुणा सागर। प्रभु जी
आस जगी है मन के अन्दर । प्रभु जी
अलख जगाई तेरे दर पर। प्रभु जी
आओ मेरी विनती सुन कर । प्रभु जी
झूम उठे हैं धरती अम्बर। प्रभु जी










