संगीनों के आगे सीना

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स्वामी श्रद्धानंद गीत

संगीनों के आगे सीना,
खोल खड़ा था सन्यासी I
सिंह सरीखा निर्भय था जो,
कौन था वो गुरुकुलवासी II

जिस दिन हुआ बरेली में था ,
दर्शन उसे दयानंद का I
उस दिन मुंशीराम के उर में ,
बीज पड़ा श्रद्धानंद का II

आस्तिकता के अंकुर फूटे ,
जीवन ने अंगड़ाई ली I
देश –धर्म का बना वो प्रहरी ,
जग से मोल लड़ाई ली II
नास्तिक मुंशीराम बन गया ,
पक्का ईश्वर –विश्वासी I
कौन था वो गुरुकुलवासी …..

किसने ‘शुद्धि’ की बजा बांसुरी ,
बिछड़े भाई बुलाये थे I
किसने घटती आबादी पर ,
सारे हिन्दू चेताये थे II

किसने उद्धार किया दलितों का ,
जाति के बंधन तोड़े I
छुआछूत का भेद मिटाया ,
दिल से दिल के रिश्ते जोड़े II

दृढ़ संकल्पी , पर उपकारी ,
संस्कृत प्रेमी , हिन्दीभाषी I
कौन था वो गुरुकुलवासी ……

गाँधीने जिसके चरण छुए,
हर जनने जिसको नमन किया
गुरुकुलकी शिक्षा ज़िन्दाकी ,
वेदोंका फिर से स्तवन किया
‘शुद्धि’ का चक्र नहीं थमता ,
भारत का विभाजन न होता
यदि श्रद्धानंद सा राष्ट्रभक्त ,
मृत्यु की नींद नहीं सोता II

अंग्रेजों का प्रबल विरोधी ,
संघर्षों का अभ्यासी I
कौन था वो गुरुकुलवासी ….

था पलंग पर निपट अकेला ,
रुग्ण -निहत्था सन्यासी I
मार के गोली प्राण ले गया ,
‘अब्दुल रशीद’ सत्यानाशी II

एक बार देखा फिर जग ने ,
नंगा चेहरा इस्लाम का I
मानवता का शत्रु है यह ,
पंथ नही भगवान का II
राष्ट्र –यज्ञ में स्वाह हो गया ,
सबकी मुक्ति का अभिलाषी
कौन था वो गुरुकुलवासी …..

कवि : अंकुर ‘आनंद’
गायक : अरुणकुमार आर्यवीर