गई, गई, बस गई, लौट कर

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गई, गई, बस गई, लौट कर

टेक-रे बता दे कोई कहाँ गई तरुणाई?

गई, गई, बस गई, लौट कर
फिर न वह कभी आई।
रे बता दे……..
जिसकी रक्षा के हेतु खाई
मेवा और मिठाई।
दूध, दही, घी, मक्खन खाया,
हलुआ खीर मलाई ।।
रे बता दे……..

पिश्ता और बादाम छुहारे,
ढेरों किशमिश खाई।
लड्डू, पेड़ा और इमरती,
बरफी बालुशाही।।
रे बता दे……….

रसगुल्ले, रस बड़े आदि पर
जिसकी रही चढ़ाई।
उस बेवफा राँड ने मुड़कर
सूरत नहीं दिखाई।।
रे बता दे……..

चली गई चुपचाप तोड़कर,
ममता मोह मिताई।
उसे ढूँढते कमर झुक गई,
फिर भी थाह न पाई।
रे बता दे………

ऊँचे ऊँचे पर्वत लाँघे,
नीची नदियाँ खाई।
अब दस अंगुल नीचा
ऊँचा देख बुद्धि चकराई।।
रे बता दे……..

कान न सुनें आंख न देखें,
पग चलें लंगडाई।
ये तरुणाई धोका देगी,
तजकर स्नेह सगाई ।।
रे बता दे………

तन में रोग समूह समायो,
मन में भूल समाई ।।
रे बता दे………..

रे नवयुवकों बात हमारी,
सुनो कान में भाई।
इसके जाने से पहले
कुछ कर लो “अमर” कमाई।
जितना लाभ ले सको ले लो,
फिर न उठेगी पाई॥ रे बता दे…