जुल्म कितने आज बहनें सह रही।

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जुल्म कितने आज बहनें सह रही।

तर्ज – दिल के अरम…….

जुल्म कितने आज बहनें सह रही।
बोलकर मुँह से ना कुछ भी कह रही।।

देवियाँ दिन रात जलकर मर रही
ये दहेजवा ही “सचिन” वजह रही
बोलकर मुँह से ना कुछ भी कह रही
जुल्म कितने आज……….

सास ने पूछा क्या लायी
बाप से चल निकल घर से
यहाँ क्यों रह रही बोलकर
मुँह से ना कुछ भी कह रही
जुल्म कितने आज…….

एक कोने में खड़ी रोती रही
ज़िन्दगी इसकी इसे ही दह रही
बोलकर मुँह से ना कुछ भी कह रही
जुल्म कितने आज…….

आग की लपटों ने काया छान दी
अस्थियाँ हरिद्वार जल में बह रही
बोलकर मुँह से ना कुछ भी कह रही
जुल्म कितने आज………..