परम पिता से प्रीत लगा, भवसागर से पार हो जा।

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परम पिता से प्रीत लगा, भवसागर से पार हो जा।

भक्ति

परम पिता से प्रीत लगा, भवसागर से पार हो जा।
सत्संग दे विच आया कर, गुण ईश्वर के गाया कर।
जीवन वेद अनुसार बना, भवसागर से पार हो जा।
परम पिता से प्रीत लगा ………..

अन्दर है प्रीतम तेरा, मन मन्दिर में है डेरा।
ज्ञान की सच्ची जोत जगा, भवसागर से पार हो जा।।
परम पिता से प्रीत लगा ………

चल रही विषयों की अंधेरी, जोत बुझाई जिसने तेरी।
उससे अपना आप छुड़ा, भवसागर से पार हो जा।।
परम पिता से प्रीत लगा ……….

विषयों को ‘नन्दलाल’ तूं छोड़ परमपिता से नाता जोड़।
जीवन अपना शुद्ध बना, भवसागर से पार हो जा।।
परम पिता से प्रीत लगा…………

सुविचार

इन्द्राय पवते मदः
ईश्वर मनुष्य के लिए आनन्द बरसाता है।