प्यारे प्रीतम से कर मेल सजनी संभल के होली खेल।

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प्यारे प्रीतम से कर मेल सजनी संभल के होली खेल।

प्यारे प्रीतम से कर मेल
सजनी संभल के होली खेल।
पहिले तो सजले अलबेली।
सेवा साड़ी ओढ़ सहेली ।।

बुद्धि की बिन्दी लगा नवेली,
अब मत रहै अकेली ।।
करों में चूड़ी चातुरता की,
कान में बाली बल-विद्या की।
नाक में लौंग पहिन लज्जा की,
शील का शिर में तेल ।।

प्यारे० समता लच्छे डाल पगन में,
सत्य का सुर्मा सार दृगन में।
हंसी-खुशी के हों गर्दन में,
हंसल, हार हमेल ।। प्यारे०

शेष रहा जो कपड़ा गहना,
सो सब पति आज्ञा में रहना।
अब तू होली को उठ बहना,
घर के काम सकेल ।। प्यारे०

‘रूप’ कहें पतिव्रत-जल प्यारी,
धर्म का इसमें रंग मिलारी।
प्रेम की भर-२ के पिचकारी,
साजन सम्मुख पेल ।। प्यारे०