मेरे देवता के बराबर जहां में
मेरे देवता के बराबर जहां में,
कहीं देवता ना कोई और होगा।
जमाने में होगें बड़े लोग पैदा,
दयानंद सा ना कोई और होगा।।
चरित्र है देखे बड़े ऊँचे ऊँचे,
नजर भर इधर भी जरा देख लेना।
चरित्र मिलेगा ऋषिवर का ऐसा,
न देखा सुना ना कोई और होगा।।
इधर सिर्फ था ब्रह्मचारी अकेला,
उधर था विरोधी यह सारा जमाना।
विजय पाने वाला दयानंद जैसा,
न अब तक हुआ न कोई और होगा।।
उठाके जमाने का इतिहास देखो,
तो अपनो के लाखों हितैषी मिलेगें।
मगर दुश्मनों का भी हित चाहने वाला,
ऋषि के सिवाना कोई और होगा।।
हे मानव ! घरती अन्न उपजाती है, उसे खुद नहीं खाती। वृक्ष में फल लगते हैं लेकिन उन फलों को वह खुद नहीं खाता। नदी में जल होता है, जिसे नदी स्वयं नहीं पीती, गायें दूध देती है किन्तु उनका दूध सारा संसार पीता है, सूर्य के पास प्रकाश है तो क्या सूर्य अपने घर में ही उजाला करता है? चन्द्रमा में चांदनी होती है, तो क्या वह चांदनी चांद को शीतल बनाती है? ऐसे ही सन्त होते हैं, जो अपमान, हानि, कुण्ठा सब कुछ झेलकर समाज को सन्मार्ग दिखलाते हैं। इसलिए हे मानव! तुम्हारा नैतिक दायित्व है तुम केवल अपने लिए मत जियो, बल्कि तुम सबके लिए जियो, क्योंकि केवल अपने लिए जीना मनुष्यता के लिए अभिशाप है। -आचार्य चन्द्रशेखर