भक्ति दगा न देगी

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भक्ति दगा न देगी (वैराग्य गीत) (तर्ज- चुड़ी मजा न देगी कंगन मजा न देगा)

भक्ति दगा न देगी,
भगवन दगा न देगा।
जगत पिता ईश्वर का
चिन्तन दगा न देगा।।

१- ये दोस्ती ये यारी,
अर्धागिनीं जो प्यारी।
झूठे है सारे बन्धन
झूठी है दुनियादारी।
ईश्वर से बांध लो तो
बन्धन दगा न देगा।।

२- घन माल देगा धोखा,
अधर्म की डूबे नौका।
कुछ परउपकार कर ले,
तुझको मिला है मौका।
काबू में आ गया तो
फिर मन दगा न देगा।।

३- दुनिया के देख रंग ढंग,
रहता है रोज क्यों तंग।
जाया करो हमेशा
धोखा न देगा सत्संग।
वेदों व शास्त्रों का
मन्थन दगा न देगा।।

४- जीवन में तू संभल जा,
जंजाल से निकल जा।
पछताना न पड़ेगा मानव
जो तू संभल जा।।
दुर्जन से दूर रह तू,
सज्जन दगा न देगा

पुरूषार्थ से दरिद्रता,
प्रभु चिन्तन से पाप।
चुप रहने से लड़ाई,
मिट जाये अपने आप।।