गुरुकुल हरिपुर, जुनानी (ओडिशा)
की ओर से समस्त देशवासियों को
वेद स्वाध्याय = ऋषि तर्पण पर्व
श्रावणी उपाकर्म (रक्षाबन्धन)
के पावन अवसर पर हार्दिक शुभकामनाएँ!
विक्रम संवत् 2083
तदनुसार — 28 अगस्त 2026, शुक्रवार
श्रावणी उपाकर्म : ऋषि-स्मृति, आत्मपरिष्कार एवं वेदाध्ययन का महापर्व
भारतीय वैदिक संस्कृति में श्रावणी उपाकर्म केवल एक परम्परा अथवा धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि ऋषियों के प्रति कृतज्ञता, आत्मशुद्धि, वेदाध्ययन के पुनः शुभारम्भ तथा जीवन के नवनिर्माण का महान् संस्कार-पर्व है।
श्रावणी पूर्णिमा का यह पावन दिवस हमें स्मरण कराता है कि मनुष्य का वास्तविक गौरव उसके धन, पद अथवा बाह्य वैभव में नहीं, बल्कि ज्ञान, तप, चरित्र, संयम और सदाचार में निहित है।

महर्षि मनु का स्पष्ट निर्देश है—
“श्रावण्यां प्रौष्ठपद्यां वाप्युपाकृत्य यथाविधि।
युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान् विप्रोऽर्धपञ्चमान्॥”
— मनुस्मृति 4.95
अर्थात् श्रावण अस्थया नाद्रमय पूर्णिमा के दिन विधिपूर्वक उपाकर्म करके वेदाध्ययन का पुनः आरम्भ करना याहिए।
पारस्कर गृह्यसूत्र, आडलायन गृह्यसूत्र तथा तैत्तिरीय आरण्यक आदि वैदिक ग्रन्थों में श्रावणी उपाकर्म का विस्तृत विधान वर्णित है। इस दिन ऋषि-तर्पण, यज्ञ, गायत्री जप, मज्ञोपवीत परिवर्तन तथा वेदस्वाध्याय का संकल्प लेकर ऋषि-परम्परा के प्रति अपनी अड्डा प्रकट की जाती है। उपाकर्म का वास्तविक अर्थ है- श्रेष्ठ कर्मों की ओर पुनः लौटना। जीर्ण यज्ञोपवीत का त्याग केवल पुराने सूत्र का त्याग नहीं, बल्कि अज्ञान, आलस्य, प्रमाद, अत्तत्य, अहंकार और दुर्व्यसनों का परित्याग है। नवीन यज्ञोपवीत धारण करना सत्य, ज्ञान, संयम, सेवा, स्वाध्याय और आत्मानुशासन को जीवन में धारण करने का संकल्प है।

वेद का दिव्य जवान है- “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” अर्थात् सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ, सुसंस्कृत एवं उदात्त बनाने का प्रयास करो। यह महान् कार्य तभी सम्भव होगा, जब प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को श्रेष्ठ बनाएँ। श्रावगी उपाकर्म इसी आत्मोत्थान का प्रेरक पर्व है। यजुर्वेद की प्रेरणा है-“आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” अर्थात् संसार के सभी ओर से कल्याणकारी विचार हमारे पास आएँ। श्रावणी उपाकर्म हमें उदार, विवेकशील एवं सतत् ज्ञानार्जनशील बनने की प्रेरणा देता है। महर्षि दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थप्रकाश में वेदाध्ययन, यज्ञ, ब्रह्माचर्य, स्वाध्याय और संस्कारों को व्यक्ति तथा राष्ट्र की उन्नति का मूल आधार बताया है। उनके अनुसार जो समाज वेदों से विमुख हो जाता है, यह अपने नैतिक और सांस्कृतिक वैभव को खो देता है। अतः श्रावणी उपाकर्म केवल व्यक्तिगत संस्कार नहीं, बल्कि वैदिक संस्कृति के संरक्षण का राष्ट्रीय अभियान है।
आज आवश्यकता है कि हम इस पर्व को केवल कर्मकाण्ड तक सीमित न रखें, बल्कि इसे चरित्र-निर्माण, परिवार निर्माण, समाज-निर्माण और राष्ट्र-निर्माण का संकल्प पर्व बनाएँ।
इस आवगों उपाकर्मकामारा संकल्य
1. प्रतिदिन संध्या, गायत्री जप एवं स्वाध्याय करेंगे।
2. वेद, संस्कृत तथा ऋषि-साहित्य के अध्ययन और प्रचार में योगदान देंगे।
3. अष्टांग योग, सत्य, शुचिता, ब्रह्मवर्ग, सेवा और सदाचार को जीवन का आधार बनाएँगे ।
4. ईश्वर, गुरु, माता-पिता, समाज एवं राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक पालन करेंगे।
5. वैदिक संस्कृति के संरक्षण और विश्वकल्याण के लिए सतत् प्रयत्नशील रहेंगे।
श्रावणों पर आयोजित कार्यक्रम
1. नवीन प्रविष्ट ब्रह्वाचापियों का उपनयन
2. तप्तदश बतुर्वेद पारायण का शुभारभ।
3. क्रियात्मक जीवन निनांग शिविर का समागन।
4. ब्रह्मचारियों का शारीरिक, बौद्धिक, सांस्कृतिक प्रतिभा प्रदर्शन।
विशेष सूचना
1. भारतीय संस्कृति की अमूल्यनिधि तथा देव, ऋषि व पितृऋण से उऋण होने का पाउन प्रतीक यह यज्ञोपवीत आपकी सेवा में सादर मेषित है। कृपया इसे सानन्द स्वीकार कर वावगमूर्तिया के शुभ अवसर पर अपने पुराने महोपवीत परिवर्तन कर इस नूतन मज्ञोपवीत को श्रद्धापूर्वक धारण करें।
2. 23 अगस्त से प्रारम्भ हुआ सप्तचतुर्वेद पारायण की पूति 04 सितम्बर 2026 दिन शुक्रवार को श्री केसर पर होगी। अतः आप सभी गुरुकुल संरकृति नेगी दिव्यानाओं तो साग्रह अनुरोध है कि इन 13 दिनों तक चलने वाला वेदात्तमण यहा में वातमान बनकर पुष्प के अधिकारी बनें।
आइए, श्रावणी उपाकर्म को केवल परम्परा नहीं,
बल्कि आत्मपरिष्कार और राष्ट्रोन्नति का संकल्प बनाएँ।
वेद पढ़ें — वेद समझें — वेद के अनुसार जीवन जिएँ।
गुरुकुल हरिपुर
ग्राम — जुनानी, पोस्ट — गोड़फूला
जिला — नुआपड़ा (ओडिशा) — 766105
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