अमृत वेले जाग
अमृत वेले जाग, अमृत बरस रहा।
प्रभु चिन्तन में लाग, अमृत बरस रहा।।
नीरस जीवन में रस भर ले,
धार धर्म भवसागर तर ले।
आलस निद्रा त्याग, अमृत बरस रहा।।
सत्य ज्ञान की ओढ़ चुनरिया,
छोड़ चलो तुम प्रेम-नगरिया ।
खुल जाए तेरे भाग, अमृत बरस रहा ।।
परोपकार का लक्ष्य बना ले,
ऊँचा अपना हाथ उठा ले।
धो कुसंग के दाग, अमृत बरस रहा ।।
बड़े भाग्य से नर तन पाया,
देख तुझे सब ने समझाया।
राख इसे बेदाग, अमृत बरस रहा ।।
























