विधर्मी होने से बचा लिया सत्यार्थ प्रकाश

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विधर्मी होने से बचा लिया सत्यार्थ प्रकाश

विधर्मी होने से बचा लिया सत्यार्थ प्रकाश

दक्षिण अफ्रीका के आर्य समाज के इतिहास में “भवानी दयाल सन्यासी जी” के कृतित्व का अत्यंत विशिष्ट स्थान है। उनका जन्म दक्षिणी अफ्रीका में हुआ था।

उनके माता-पिता प्रतिज्ञाबद्ध कुली प्रथा के अधीन उस देश में ले जाए गए थे, प्रतिज्ञाबद्धता के अवधि के समाप्त होने पर वह वहीं बस गए, और उन्होंने अपने व्यापार द्वारा अपनी आर्थिक स्थिति सुदृढ़ कर ली।

मातृभूमि का आकर्षण उन्हें भारत ले आया और यहां उन्होंने अपने गांव जो बिहार के भोजपुर में था, के समीप काफी जमीन क्रय कर ली। उन्होंने यह भी प्रयत्न किया कि ठाकुर बिरादरी में उन्हें अपना सदस्य स्वीकार कर ले।

उनका जन्म राजपूत कुल में हुआ था, पर समुद्र पार रह जाने के कारण उन्हें बिरादरी से बहिष्कृत कर दिया गया था।

भवानी दयाल की आयु उस समय 12 साल की थी, इस अपमान को वे नहीं सह सके और हिंदू समाज की संकीर्णता के प्रति उनके हदय में उव्वेग होने लगा। हिंदू धर्म से उनकी आस्था उठती जाती थी क्योंकि इस धर्म के जिस स्वरूप के संपर्क में आए थे वह अत्यंत विकृत था।

इसी समय “वीर भारत” नाम के समाचार पत्र की एक प्रति उनके हाथ लग गई, जिसके एक लेख में यह कहा गया था कि “स्वामी दयानन्द” ने “सत्यार्थ प्रकाश” लिखकर भारत का सत्य्यमाश कर डाला।

भवानी दयाल जी को यह जानने की उत्सुकता हुई कि दयानंद कौन थे, उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश में क्या लिखा है। मेरठ के पंडित तुलसीराम स्वामी से उन्होंने सत्यार्थ प्रकाश, संस्कार विधि और ऋग्वेदादि भाष्य भूमिका आदि महर्षि कृत ग्रंथ्थ मंगवा ली, और उन्हें पढ़ना शुरू कर दिया।

जब ‘सत्यार्थ प्रकाश’ ने दिखाई नई राह

‘सत्यार्थ प्रकाश’ का भवानी दयाल जी के जीवन पर अत्यंत गहरा प्रभाव पड़ा। अपनी आत्मकथा में वे इस अनुभव को अत्यंत मार्मिक शब्दों में स्मरण करते हैं—

“जिस दिन मैंने सत्यार्थ प्रकाश पढ़ना शुरू किया था, उस दिन खाना-पीना और सोना सब भूल गया था। मेरी आत्मा धार्मिक क्षुधा से छटपटा रही थी, उसको स्वादिष्ट और पुष्टिकर भोजन मिल गया। इस ग्रंथ के पाठ से मेरे अंतरपट खुल गए, मेरे सामने नवजीवन की ज्योति जगमगा उठी।”


आचार्य संजय सत्यार्थी
आर्योपदेशक, पटना
📞 7717766151

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