नारी जागरण में आर्य समाज की भूमिका

0
18

– श्रीमती कमला सिंघवी

सन् १६७५ अन्तर्राष्ट्रीय महिला वर्ष के रूप में सर्वत्र मनाया जा रहा है। नारी स्वतन्त्रता और नारी जागरण के चर्चे आज आम बात है। लगता है नारी-स्वातन्त्र्य के इस आन्दोलन की प्रतिध्वनियाँ सुदीर्घ काल तक हमारे बीच रहेंगी। काँग्रेस संसदीय दल की कार्यकारिणी ने भी अनुरोध किया है कि महिलाओं के साथ सभी प्रकार के भेदभावों को समाप्त किया जाये और उन्हें प्रत्येक क्षेत्र में पुरुषों के समान अधिकार मिल सकें, इसके लिए कानूनी कार्यवाही की जाये, आवश्यकतानुसार संबन्धित कानूनों में संशोधन भी किये जायें ।

आर्य समाज ने इस दिशा में बहुत पहले ही अद्भुत कदम उठाकर, नारी मन में चेतना, जागृति और साहस की लहर उत्पन्न करने का प्रयत्न किया था। इस वर्ष जबकि आर्य समाज अपना शताब्दी समारोह मना रहा है, नारी अधिकारों और नारी सुधारों के प्रति उसके योगदान और दृष्टि- कोण, दोनों का स्मरण होना ऐसे अवसर पर स्वाभाविक है। नारियों को जब परदे और घर की देहरी से आगे बढ़ने तक पर समाज ने प्रतिबन्ध लगा रखे थे, उस समय आर्य समाज ने उनके विरूद्ध आन्दोलन छेड़ा था । कन्याओं के विद्यालय प्रारम्भ में जब आर्य समाज ने खोले तो हिन्दुओं ने ही उसका यह कहकर विरोध किया कि लड़कियों को पढ़ा-लिखाकर मेम थोड़े ही बनाना है।

आर्य समाज ने समाज सुधार की श्रृंखला में भी नारियों की समस्या को प्राथमिकता दी और समाज में व्याप्त पारिवारिक कुरीतियों को समूल उखाड़ फैकने के लिए कमर कस ली। हिन्दू महिलाओं की दयनीय दशा को देखकर रोना आता था। ईसाइयों ने तो कभी सिद्धान्त रूप में ही नारियों में जीवात्मा नहीं मानी थी। पर हिन्दू समाज तो उसे प्रत्यक्ष व्यवहार में परिणत कर रहा था। मषि दयानन्द और उनके आर्य समाज ने हिन्दू- समाज को एक नया क्रान्तिकारी दृष्टिकोण दिया जो आगे चलकर परिवर्तन के मोर्चे को सुदृढ़ करने में सहायक सिद्ध हुआ। स्वामी जी इस युग के उन महापुरुषों में थे जिन्होंने एक मन्दिर के चबूतरे पर खेलती हुई ६ वर्ष की बालिका को देखकर अपना मस्तक झुका दिया। देखने वाले ने जब यह प्रश्न किया कि वैसे आप मूति पूजा का खण्डन करते हैं किन्तु मूर्ति का यह प्रभाव है कि आपका मस्तक अपने आप झुक गया। उन्होंने उत्तर दिया – मैंने अपना माथा मूति को नहीं झुकाया अपितु इस छोटी-सी बालिका को झुकाया है। मैं इसका अभिवादन करके मातृशक्ति का अभिवादन कर रहा हूँ।

शिक्षा के क्षेत्र में पहल :

नारियों की शिक्षा के क्षेत्र में भी आर्य समाज ने युगान्तरकारी परि- वर्तन किये। “स्त्री शूद्रोनाघी यातामिति श्रुतेः” वाली मनघडन्त श्रुति को आर्यसमाज के प्रवर्तक स्वामी दयानन्द जी ने कभी प्रामाणिक नहीं माना । बल्कि यजुर्वेद के आधार पर उन्होंने यह प्रतिपादित किया-वेदों का प्रकाश ईश्वर ने सबके लिए किया है। अतः यह अनिवार्य हो जाता है कि लड़कों और लड़कियों को विज्ञान और विदुषी बनाने के लिए तन-मन-धन से प्रयत्न किया जाये जिससे स्त्रियाँ भी वेदाभ्यास करके गार्गी, मैत्रेयी आदि विदुषियों की भाँति विदुषी बन सकें और तेजस्वी व्यक्तित्व विकसित कर सकें।” स्त्रियों के पढ़ने का निषेध आर्थ समाज ने सदैव मूर्खता, • स्वार्थपरता और निर्बुद्धि का परिचायक माना है। स्वामी जी के अनुसार विद्वान पति और अनपढ़ एवं असंस्कृत पत्नी गृहस्थी की गाड़ी को सुचारू रूप से कदापि नहीं खींच सकते। शिक्षित नारी ही अपने अधिकारों के प्रति मूलरूप से जागरूक रह सकती है। इसीलिए उन्होंने पुरुषों के समान स्त्रियों को भी व्याकरण, धर्मशास्त्र, आयुर्वेद, गणित, शिल्प आदि सभी शिक्षाओं के लिए योग्य ठहराया ।

१६वीं सदी के मध्य भाग में परदे की प्रथा तेजी से बढ़ रही थी। वैदिक और बौद्धकाल तक भारतीय स्त्रियों में पर्दे की प्रथा का उल्लेख नहीं मिलता। मुगलशासन काल की देन के रूप में इस कुप्रथा ने स्त्रियों की स्वतन्त्रता का हरण किया। आर्य समाज ने स्त्री शिक्षा के साथ-साथ

इस ओर भी ध्यान दिया और सार्वजनिक कार्यक्रमों एवं समारोहों में स्त्रियों की उपस्थिति पर बल दिया। धीरे-धीरे आर्य समाज के प्रयत्नों से परदे की प्रथा एक ढोंग समझी जाने लगी और आर्य स्त्रियाँ इसे अपना अपमान समझने लगीं।

सती प्रथा के विरुद्ध भी आर्य समाज ने अपनी बुलन्द आवाज उठाई और विधवाओं के मन और मस्तिष्कों पर नई चेतना के बीज अंकुरित किये। उन्हें नवजीवन और नव दिशा मिल सके, इसके लिए पुविवाह की व्यवस्था करने का प्रयास किया और उसे अपना सम्पूर्ण क्रियात्मक समर्थन दिया ।

बाल विवाह के संबंध में सहस्रों कठिनाइयों एवं बाधाओं के बावजूद आर्य समाज में प्रगतिशील कदम उठाकर इसी कुरीति के विरूद्ध अभियान छेड़ा था। धीरे-धीरे विवाह योग्य आयु का स्तर ऊंचा होता गया और बहुत छोटी आयु के विवाह लगभग बन्द होने लगे। सेण्ट्रल असेम्बली में राजस्थान के प्रसिद्ध आर्यसमाजी नेता दीवान बहादुर हविलास जी शारदा ने तो इसके लिए कानून भी बनवाया था। आर्यसमाज का कहना था ‘बाल्यावस्था में विवाह से जितनी हानि पुरुष की होती है उससे अधिक स्त्री की होती है। जैसे कच्चे खेत को काट लेने में अन्न नष्ट हो जाता है, कच्चे फल और ईख में मिठास नहीं होता, ठीक उसी तरह छोटी बायु में जो अपनी सन्तानों का विवाह कर देते हैं उनका वंश बिगड़ जाता है।” बाल विवाह की तरह वृद्ध विवाह को भी हेय दृष्टि से देखा जाने लगा और लोग वृद्ध के लिए कुमारी कन्या से विवाह को त्याज्य मानने लगे।

आर्य समाज ने बहुविवाह का भी जमकर विरोध किया और एक विवाह के आदर्श सिद्धान्त का प्रतिपादन किया। यही नहीं आर्य समाज ने स्त्रियों में जागृति के लिए यह सन्देश भी दिया कि विवाह के लिए केवल माता-पिता की अनुमति ही पर्याप्त नहीं, बल्कि वर-कन्या की अनुमति को प्राथमिक मान्यता दी जानी चाहिए ।

परिवार में नारी की प्रतिष्ठा के विषय में स्वामी जी पूर्णतया मनु से सहमत थे कि ‘यत्त्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्न देवताः’ उन्होंने जननी का स्थान सर्वोपरि मानकर नारी के गौरव को सदा के लिए अक्षुण्ण बना दिया ।

दहेज की अग्नि से दग्ध समाज को आर्य समाज ने शीतल छींटे दिये और दहेज के परिणामों की ओर समाज का ध्यान आकर्षित किया। बिना दहेज के गरीब घरों की जिन कन्याओं के हाथ पीले नहीं हो पाते थे उन्हें आर्य समाज का आन्दोलन वरदान बनकर आया ।

इस प्रकार आर्य समाज ने परम्परा को संशोधित रूप दिया और इस गलत धारणा को निर्मूल कर दिया कि भारतीय धर्म और संस्कृति में नारी के स्वतन्त्र विकास और गौरव के लिए कोई स्थान नहीं है। स्वामीजी ने महिलाओं की मर्यादा और शालीनता की सुरक्षा रखते हुए उसकी मुक्ति और विकास का मार्ग प्रशस्त किया। यह स्मरणीय है कि दयानन्द जी ने जिस युग में नारी जागरण का शंखनाद किया था उस समय हमारा समाज विकृत और पतनोन्मुख था। भारत राजनैतिक दासता के कारा- गार में बन्दी था। हम स्वयं अपने भाग्य विधाता नहीं थे। किन्तु अज्ञान के अंधेरे को चीरकर स्वामीजी का उज्ज्वल सन्देह अरूणोदय बनकर भारतीय आकाश पर छा गया। स्वामीजी की कल्पना एक विवेकशील और गतिशील समाज की कल्पना थी, एक ऐसे समाज की कल्पना थी जो अपने अतीत के गौरव को आत्मसात कर सके और उसी के अनुरूप एक नये भविष्य का निर्माण कर सके। आज जबकि हम स्वतन्त्र और स्वाधीन हैं, नये समाज की संरचना में संलग्न हैं और नारी स्वतन्त्रता के आधारभूत सिद्धान्त को स्वीकार कर चुके हैं, एक बार फिर वर्तमान परिप्रेक्ष्य में स्वामी दयानन्दजी के सन्देश की संजीवनी शक्ति को सामाजिक जीवन में ग्रहण करने की अपेक्षा है, नारी जागरण के मर्म को विवेक के साथ व्याख्या की जरूरत है। (युगवार्ता)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here