पंडित चमूपति जी के स्वामी दयानन्द के प्रति प्रेरणादायक उदगार

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पंडित चमूपति जी के स्वामी दयानन्द के प्रति प्रेरणादायक उदगार


(आर्यसमाज के अग्रिम विद्वान, चिंतक एवं लेखक पंडित चमूपति जी के जन्मदिवस 15 फरवरी 1893 को विशेष रूप से प्रकाशित)
पं चमुपति जी लिखते हैं कि आज केवल भारत नही,सारे संसार पर दयानंद का सिक्का है। मतों के प्रचारकों ने अपने मन्तव्य बदल लिए हैं,धर्म पुस्तकों का संशोधन किया है,महापुरूषों की जीवनियों में परिवर्तन किया है।
स्वामी जी का जीवन इन जीवनियों में बोलता है।ऋषि मरा नहीं करते,अपने भावों के रूप में जीते हैं।
दलितोद्दार का प्राण कौन है? पतित पावन दयानंद।
समाज सुधार की जान कौन है?आदर्श सुधारक दयानंद।
शिक्षा के प्रचार की प्रेरणा कहां से आती है?गुरूवर दयानंद के आचरण से।
वेद का जय जयकार कौन पुकारता है?ब्रहंर्षि दयानंद।
माता आदि देवियों के सत्कार का मार्ग कौन सिखाता है?देवी पूजक दयानंद।


गोरक्षा के विषय में प्राणिमात्र पर करूणा दिखाने का बीङा कौन उठाता है?करूणानिधि दयानंद।
आओ हम अपने आप को ऋषि दयानंद के रंग में रंगे।हमारा विचार ऋषि का विचार हो,हमारा अचार ऋषि आचार हो,हमारा प्रचार ऋषि का प्रचार हो।हमारी प्रत्येक चेष्टा ऋषि की चेष्टा हो।नाङी नाङी से धवनि उठे।
महर्षि दयानन्द पापों और पाखंङो से ऋषि राज छुङाया था तूने।
भयभीत निराश्रित जाति को, निर्भिक बनाया था तूने।।
बलिदान तेरा था अदिव्तीयहो गई दिशाएं गुंजित थी
जन जन को देगा प्रकाश वहदीप जलाया था तूने।।
हमारा सौभाग्य है और अपने इस सौभाग्य पर हमें गर्व है कि हम महर्षि दयानंद दव्ारा प्रदर्शित ईश्वरीय ज्ञान वेदों के अनुयायी हैं।महर्षि दयानंद दव्ारा प्रदर्षित मार्ग एेहिक व पारलौकिक उन्नति अथवा अभु्युदय व नि:श्रेयस प्राप्त कराता है।
इसे यह भी कह सकते है कि वेद मार्ग योग का मार्ग है।जिस पर चलकर धर्म,अर्थ,काम व मोक्ष की प्राप्ति होती है।
संसार की यह सबसे बङी संपदाये हैं।अन्य सभी भौतिक संपदाये तो नाशवान हैं परन्तु दयानंद जी दव्ारा दिखाई व दिलाई गई संपदाये जीते जी तो सुख देती हैं मरने के बाद भी लाभ ही लाभ पहंुचाती है।
आत्म जोत काव्य के माध्यम से पंडित जी स्वामी दयानन्द की श्रद्धांजलि देते है।


लगे मेरे स्वामी को छाले सताने ।लगे बीसियों दस्त उन्हें ज़ोर आने ॥
किया ज़हर का काम उल्टा दवा ने ।न आई तबीअत , न आई ठिकाने ॥
ऋषिवर की किस्मत के थे फेर उल्टे।मुआलज थे हमराज़ सब नन्ही जाँ के ॥
रहे दस्त पर दस्त हर रोज़ जारी।लगी बेहोशी रह रह के तारी ॥
हरारत से बढ़ती गई बेकरारी ।ऋषि की हुई लागू शामत हमारी ॥
फफोले उठे नाफ़ से थे ज़बाँ तक ।ज़िगर से यही सोज़ पहुँचा था जाँ तक ॥
वोह स्वामी जो हाथी की ताकत था रखता।उठी तेग़ को हाथ से टुकड़े करता ॥
था बेख़ौफ़ राजों के सिर पर गर्जता।था लाचार खटिया पै आज आह ! लेटा ॥
तड़पते कटीं दर्द से सत्रह रातें ।न आराम आया जरा जोधपुर में ॥
लगे कहने स्वामी चलीं कोह आबू ।नहीं चैन आने का याँ कोई पहलू ॥
हवा में होता है पहाड़ों की जादू ।कहीं रोग का मेरे शायद हो दारु ॥
लगे राजा रोने “कटी नाक मेरी ।ऋषि जो गये राज से मेरे रोगी ” ॥
ऋषि को सुलाया गया पालकी में।था डूबा खड़ा राजा शर्मिन्दगी में ॥
न रखा दकीका उठा बन्दगी में।कहा पाओं पर गिर के अरमाँ है जी में ॥
जो सेहत में करता ऋषिवर को रुख़सत ।न यूँ पाओं पड़ने में होती नदामत ॥
किसी डाक्टर ने जो स्वामी को देखा।कहा तेरा साधु जिगर है ग़ज़ब का ॥
तू इस दर्द में है ज़मीयत से जीता।नहीं उफ़ ज़बाँ से तिरी कोई सुनता ॥
गये कोह आबू से अजमेर स्वामी।इशारे में करते थे शीरीं कलामी ॥
कहा एक दिन कोई नाईं बुलाओ।हमें आज पानी से मिलकर नहाओ ॥
जो खाना कि हो सबसे शीरीं पकाओ।हलावत का इक ख़ांनचा भरके लाओ ॥
थे सब शुक्र करते , है हाल आज अच्छा।खबर क्या ? संभाला था बीमार लेता ॥
नहा कर जमाया ऋषिवर ने आसन।हुए ध्यान में महव खुलवा के रोज़न ॥
सुरें वेद की मीठी-मीठी नवाज़न ।पकड़ती थी अनवारे रहमत जा दामन ॥
रज़ा पर कहा तेरी साईं ! हूँ राजी।वोह लो ! आत्मा साँस के साथ चलदी ॥
ऋषि चैन से आख़री नींद सोया।था चेहरे पै नूर अब भी उसके चमकता ॥
गुरुदत्त कि रखते थे ईमान बोदा।समाँ देखकर उन पै छाया अचम्भा ॥
कहा मर के भी तुम नहीं स्वामी मरते।हैं मुर्दार हम जैसे मरने से डरते ॥
ज़मी आई कहती यह मिट्टी है मेरी।ख़ला में ख़ला , बाद में बाद पहुँची ॥
यह कहती हुई आग वेदी से उठी।हमारा महर्षि ! हमारा महर्षि ॥
किया मौत ने तेरी हर सू उजाला।दयानन्द स्वामी ! तिरा बोल बाला ॥

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