केरल में स्वामी दयानन्द की विचारधारा के प्रचारक चट्टमपी स्वामी 1853-1924
डॉविवेकआर्य
गुजरात प्रदेश में जन्मे स्वामी दयानंद ने वैदिक धर्म का प्रचार महाराष्ट्र से लेकर पंजाब तक अपने 11 वर्ष के प्रचार काल में किया। मुख्य रूप से उत्तर भारत के लोगों ने उनकी बात को समझा और अपनाया। कुछ लोग यह कहते हैं कि स्वामी दयानंद की विचारधारा का दक्षिण भारतीय प्रांतों में न के बराबर प्रभाव रहा। चट्टमपी स्वामी के जीवन के अनुशीलन से इस धारणा का निराकरण होता है। आप उन श्रेष्ठ और प्रतिभाशाली पुरुषों में से एक थे जो स्वामीजी की विचारधारा से न केवल प्रभावित थे अपितु उन विचारों का प्रचार करने में अपना जीवन भी लगा दिया था।
आपका जन्म पौराणिक नम्बूदरी ब्राह्मणों के गढ़, अद्वैत विचारधारा के प्रांगण में, अनार्ष भाष्यों में प्रतिपादित यज्ञ, पशुबलि के समर्थक, जन्मना ब्राह्मण जाति को श्रेष्ठ मानने वाले, नारी को हेय दृष्टि से देखने वाले समाज के मध्य केरल में हुआ, जिस पर मोपला मुस्लिम संगठन व ईसाई मिशनरी अपनी गिद्ध दृष्टि गढ़ाये बैठी थी। ऐसे विकट समय में सत्यार्थप्रकाश की विचारधारा से प्रभावित होकर आपने हिन्दू जाति के उद्धार का बीड़ा उठाया।
अपने सर्वप्रथम वेदों के रूढ़िवादी भाष्यों का विरोध किया। मांसाहार को त्याज्य बताकर शाकाहार को अपनाने का प्रबल समर्थन किया। केरल में उस काल में नारी जाति की स्थिति अत्यंत विषम थी। कोई भी नम्बूदरी ब्राह्मण नीची जाति की नारी से इच्छानुसार भोग कर सकता था। आपने इस कुप्रथा का विरोध कर नारी को स्वाभिमान से जीवन जीने व समाज में श्रेष्ठ बनने का संदेश दिया।
ईसाई मिशनरियों द्वारा हिन्दुओं को विभिन्न प्रलोभनों में फंसाते देख सत्यार्थप्रकाश के 13वें सम्मुलास से प्रभावित होकर आपने अत्यंत प्रभावशाली पुस्तक लिखी, जिसका नाम ‘क्राईस्ट-मत-निरूपणम्’ था। यह पुस्तक मलयालम भाषा में थी। कहा जाता है कि इस पुस्तक ने हजारों की संख्या में हिन्दू युवकों को ईसाई होने से बचाया था।
यह पुस्तक सन् 1890 में छपी थी। अंग्रेजों ने देखा कि उनका भेड़ बनाने का मिशन खतरे में है तो उन्होंने इस पुस्तक को प्रतिबंधित कर दिया। आजादी के बाद से इस पुस्तक को कुछ हिन्दू संगठनों ने छापना शुरु किया था। आजकल इसका अंग्रेजी अनुवाद भी उपलब्ध है।
वेद केवल ब्राह्मणों के लिए है, इस संकीर्ण विचार का विरोध करते हुए, कौन वेद का पात्र है और कौन नहीं? आपने एक पुस्तक लिखी, जिसका नाम ‘वेदाद्दिकार निरूपणम्’ था। इस पुस्तक से जातिवाद पोषक नम्बूदरी ब्राह्मणों में खलबली मच गई थी।
आपको केरल के जाने-माने समाज-सुधारक महात्मा नारायण गुरु का गुरु होने का सौभाग्य भी प्राप्त है। आपकी प्रगतिशील विचारधारा का प्रभाव नारायण गुरु के समाज सुधारों में स्पष्ट झलकता है।
आपके पिता का नाम श्री वासुदेव शर्मा नम्बूदरी व माता का नाम नंगाम्मा था। आपका पूरा जीवन हिन्दू जाति के उत्थान में लगा रहा। आपको विचारों में स्वामी दयानंद के विचारों का प्रभाव किस सीमा तक है इसका आकलन आप उनके ग्रंथों को पढ़कर आसानी से कर सकते हैं।
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