आज आदम की आदत के ऊपर शर्म को शर्म आने लगी है।

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आज आदम की आदत के ऊपर शर्म को शर्म आने लगी है।

आज आदम की आदत के ऊपर शर्म को शर्म आने लगी है।

आज आदम की आदत के ऊपर,
शर्म को शर्म आने लगी है।
दिल की धड़कन बढ़ी,
होंठ फड़के, आंखें आंसू बहाने लगी है
लाखों बर्बादियों से गुजरकर,
समझा था कुछ राहत मिलेगी,
सारी आशा निराशा में बदली,
खुशी मातम मनाने लगी है।।1।।

पन्छी पिंजरे से तो छूट गया था,
खूले आकाश ने मार डाला,
रक्षक ही आज भक्षक बने हैं,
बाढ़ ही खेत खाने लगी है।।2।।

ऊँची से ऊँची भरकर उड़ानें,
आदि सृष्टि से जिसमें पले
हम प्यारी संस्कृति सभ्यता वह देखों,
छोड़कर दूर जाने लगी है।।३।।

देश द्रोही छली झूठे कपटी,
लोगों का हर जगह बोलबाला।।४।।

सत्य वादियों की सत्य कहते,
अब जुवां लड़खड़ाने लगी हैं।
खतरे के मिल रहे हैं इशारे,
आगे आसार अच्छे नहीं है,
प्रेमी वायु में विष भर गया हैं,
पृथ्वी भी डगमगाने लगी है।।5।।