जो मात-पिता है पूज्य अरे !
जो मात-पिता है पूज्य अरे!
तुम उनको क्यों ठुकराते हो।
जिसने तुमको पाला पोसा,
उनको ही अकड़ दिखाते हो।
बचपन में जब रोते देखा,
तो तुम्हें गोद में उठा लिया।
थोड़ा भी देख दुःखी अगर,
चूमा पुचकारा प्यार किया।
उपकार अपार किये इन्होंने,
क्या उन सबको तुम भूल गये।
सब समर्थ होकर निर्लज्जों।
तुम इन पर रौब जमाते हो।
जो मात-पिता है पूज्य अरे!
तुम उनको क्यों ठुकराते हो।।।।
हाँ! स्वयं भूख सहकर माँ ने,
भर पेट तुम्हें खिलाया था।
खुद तो गीले में सोई माँ,
सूखे में तुम्हें सुलाया था।
नस नस में माँ के आँचल का,
जो दूध प्रवाहित होता है।
तुम उसे कलंकित करते हो,
यह लख पत्थर भी रोता है।
इन्होंने तो फूल बिछाये तुम्हें,
तुम कांटे क्यों बिछाते हो।
जो मात-पिता हैं पूज्य अरे!
तुम उनको क्यों ठुकराते हो।।2।।
तुम लाखों रोज कमाओ,
पर किंचित् भी लाभ नहीं इनको।
तुम दुनिया से आदर पावो,
पर इससे क्या मिलता इनको।
तो जग के सारे सुख साधन,
काँटे बन जायेंगे तुमको।
इसलिए आशीष लो इनके,
क्यों इनका हृदय दुःखाते हो।
जो मात-पिता है पूज्य अरे!
तुम उनको क्यों ठुकराते हो। ।3।।
इन्होंने तो निश्छल प्यार किया,
तुम इनसे कटुता रखते हो।
क्यों तुनक-तुनक कटु वचनों से,
इनका मन छलनी करते हो।
वैसा ही अपने पुत्रों से,
तुम पाओगे लिखकर रख लो।
तुम भी दुत्कारे जाओगे,
क्यों अभिमान दिखाते हो।
जो मात-पिता है पूज्य अरे!
तुम उनको क्यों ठुकराते हो।।4।।










