उठो दयानन्द के सिपाहियों, समय पुकार रहा है।
उठो दयानन्द के सिपाहियों,
समय पुकार रहा है।
देशद्रोह का विषधर फन,
फुला फुंकार रहा है। ।टेक।।
उठो विश्व की सूनी आँखें,
काजल मांग रही है।
उठी अनेकों दुपद-सुताएँ,
आँचल मांग रही हैं।
मरघट को पनघट-सा कर दो,
जग की प्यास बुझा दो।
भटक रहे जो मरुस्थलों में,
उनको राह दिखा दो।
गले लगा लो उनको,
जिनको जग दुत्कार रहा है।
उठो दयानन्द के सिपाहियों………..
तुम चाहो तो खारे जल को,
सोम बना सकते हो।
तुम चाहो तो पत्थर को भी,
मोम बना सकते हो।
तुम चाहो तो बंजर में भी,
बाग लगा सकते हो।
तुम चाहो तो पानी में भी,
आग लगा सकते हो।
जातिवाद जग को नस-नस में,
जहर उतार रहा है।
उठो दयानन्द के सिपाहियों …….
याद नहीं क्या भूल गए,
जो ऋषि को वचन दिया था।
शायद वायदा याद नहीं,
जो आपने कभी किया था।
वचन दिया था ओम्-पताका,
कभी न बुझने देंगे।
हवन-कुण्ड की अग्नि घरों से,
कभी न बुझने देंगे।
लहू शहीदों का,
गद्दारों को धिक्कार रहा है।
उठो दयानन्द के सिपाहियों ………..
उजली-उजली दिखने वाली,
हर चादर मैली है।
लेखराम का लहू पुकारे,
आँख जरा तो खोलो।
एक बार मिलकर सारे,
ऋषि दयानन्द की जय बोलो।
वेदज्ञान का ‘व्यथित’
सूर्य तुम्हें निहार रहा है।
उठो दयानन्द के सिपाहियों ……….










