गोलियाँ सीने पे खा के चल दिये।
गोलियाँ सीने पे खा के चल दिये।
प्यास कातिल की बुझा के चल दिये।।
रक्त से वैदिक बगीचा सींचकर।
धर्म हित मरना सिखा के चल दिये ।।1।।
गोलियाँ सीने पे खा……..
झुक रहीं संगीन सीना सामने।
गंगा तट जंगल में मंगल कर दिया।
कदम आगे को बढ़ा के चल दिये।
काँगड़ी गुरुकुल बना के चल दिये।2।।
गोलियाँ सीने पे खा…….
जामा मस्जिद पे खड़े हो इक दिन।
वेद ध्वनि सबको सुनाके चल दिये।।
पाठ समता का पढ़ाया आपने।
चक्र शुद्धि का चला के चल दिये ।।3।।
गोलियाँ सीने पे खा……
भाई से भाई मिलाया था गले।
प्रेम की गंगा बहा के चल दिये।।4।।
गोलियाँ सीने पे खा……..










