नमस्ते नाथ अविनाशी, तुम्हें मस्तक नवाते हैं।

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भक्ति

नमस्ते नाथ अविनाशी,
तुम्हें मस्तक नवाते हैं।
तुम्हारे ध्यान चिन्तन में,
सभी आनन्द पाते हैं।।1।।

तुम्हीं सर्वेश स्वामी हो,
तुम्ही भूः हो भुवः स्वः हो।
हृदय के तारे हिलते हैं,
जभी तब गीत गाते हैं।।2।।
तुम्हारे ध्यान चिन्तन में सभी ………….

तुम्हीं जल में तुम्हीं स्थल में,
सभी मंडल में व्यापक हो।
तुम्हारे विरुद्ध वर्णन में,
यह पक्षी चहचहाते हैं।।3।।
तुम्हारे ध्यान चिन्तन में सभी………….

मिलेगी आज अनुभूति
हृदय में देव-दर्शन की।
अतः हम भक्ति-पुष्पों से
हृदय मन्दिर सजाते हैं।।4।।
तुम्हारे ध्यान चिन्तन में सभी………….

उन्हीं का आत्मिक व मानसिक
उत्थान होता है।
हटा कर ध्यान विषयों से
जो ईश्वर में लगाते हैं।।5।।
तुम्हारे ध्यान चिन्तन में सभी ………….

वही प्यारे नारायण के जो नर
सेवा में रत रहते।
दुःखी के दुःख दूर करने में
जो अपना घर लुटाते हैं।।6।।
तुम्हारे ध्यान चिन्तन में सभी……

वही है धन्य नर-नारी,
उन्हीं पै ईश अनुकम्पा।
प्रलोभन देखकर भी जो
न नैतिक स्तर गिराते हैं ।।7।।
तुम्हारे ध्यान चिन्तन में सभी……

जिन्होंने पाप की गठरी
उठाई वह दबे रहते।
सरल सच्चे सदाचारी सदा
सुख ‘पाल’ पाते हैं।।
तुम्हारे ध्यान चिन्तन में सभी……