दयानन्द बावनी
कवि दूलेराय काराणी
संगठन
जहां वर्ण चार वहां आज तो अपार भयो।
हिंदू-हिंदुत्व में भेद-भाव को बढ़ायो है॥
आपस की फूट चली छूट मारकूट चली।
विधर्मी की लूट चली गांठ को गंवायो है॥
आर्यत्व की एकता में आई है जुदाई ऐसी।
क्षीणता में क्षय को असाध्य रोग आयो है॥
काराणी कहत वाको महर्षि ने पायो भेद।
अभेद को सूत्र संगठन सिखलायो है॥१६॥
























