शिखरिणी छन्दः
दयाया आनन्दो विलसति परः स्वात्मविदितः
सरस्वत्यस्याग्रे निवसति हिता हीशशरणा।
इयं ख्यातिर्यस्य प्रततसुगुणा वेदमनना
स्त्यनेनेदं भाष्यं रचितमिति बोद्धव्यमनघाः॥३॥
॥ ऋग्वेदादिभाष्यभूमिकारम्भे ॥
अर्थ : दया का उत्कृष्ट आनन्द रमण कर रहा है जो अपनी आत्मा में प्राप्त ईश्वर शरणवाली हितकारी सरस्वती विद्या इसके आगे निवास करती है। वेद का मनन करने वाला श्रेष्ठ गुणों को फैलाने वाला स्वामी दयानन्द सरस्वती नाम जिसका प्रसिद्ध है उसके द्वारा यह वेद भाप्य वनाया गया है, एसा सभी सज्जनों को जानना चाहिए।
























