शिखरिणी छन्दः
मही रम्या शय्या विपुलमुपधानं भुजलता,
वितानं चाकाशं व्यजनमनुकूलोऽयमनिलः।
स्फुरद्दीपश्चन्द्रो विरति वनिता संगमुदितः,
सुखं शान्तः शेते मुनिरतनुभूतिर्नृप इव।।
(भर्तृहरिकृत- नीतिशतक, श्लो. ७१)
भावार्थ- मुनियों के लिए भूमि ही रमणीय शय्या है, अपनी भुजा ही तकिया है, आकाश ही उनकी चादर है, अनुकूल वायु ही उनका पंखा है, चन्द्रमा ही प्रकाशमान दीपक है, विरक्ति ही उनकी स्त्री है। इन समानों के साथ ही मुनिजन, ऐश्वर्यशाली राजा के समान सुखपूर्वक शयन करते हैं।
























